देशबड़ी ख़बरें

‘हिन्दू राष्ट्र’ का राग हिंदुत्व की बैटरी रीचार्ज करने की कसरत .!

रोती-कराहती जनता को थपकी देकर सुलाने की घृणित चेष्टा है धर्म संसद।

‘हिन्दू राष्ट्र’ का राग हिंदुत्व की बैटरी रीचार्ज करने की कसरत .!

० रोती-कराहती जनता को थपकी देकर सुलाने की घृणित चेष्टा हैं धर्म संसद।

०केशव कृपाल श्रीकेशव

 

 

प्रयागराज में आयोजित धर्म संसद/ संत सम्मेलन में भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने का धर्मादेश जारी किया गया है। सबसे पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि न ही हमारे देश की वर्तमान सरकार और न ये नामधारी साधु इस सम्मेलन के किसी प्रस्ताव को गंभीरता से लेते हैं और न ही दूर-दूर तक इसके साकार होने की रंच भर किसी को उम्मीद है।
जब अपनी ही मांग के प्रति उसके पूर्णता की कोई आशा न हो तब यह सारी दंड बैठक किसी रंगमंच पर विदूषक की प्रस्तुति से अधिक कुछ भी नहीं लगती है।

लेकिन यह सब बिना उद्देश्य के है, फिजूल है या पागलपन है, ऐसा बिल्कुल नहीं। यह एक चिंतित प्रयोग है। विदित है कि हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर जो लोग सत्ता को अपहृत कर पाए हैं, अब उनके पास हिंदुत्व की अपनी बैटरी डिस्चार्ज है।
अगर स्वप्नलोक से बाहर कुछ अच्छा काम हुआ होता तो आगे अस्तित्व को बचाने के लिए उसका सहारा लेते। ऐसे में यह धर्म संसद अथवा संत सम्मेलन पावर बैंक या बूस्टर डोज के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

हरिद्वार और रायपुर की धर्म संसद के बाद दुनियां में जो भद्द पिटी, उसके बाद संत सम्मेलन उसी का लाइट वर्जन या पोलाइट वर्जन है। लेकिन यह धर्म संसद से अलग और कम विषाक्त नहीं है। दोनों में अंतर है कि धर्म संसद में मुसलमानों को कत्लेआम की हुंकार भरी गई थी इसमें मुसलमानों से अच्छे व्यवहार का वादा किया जा रहा है।
धर्म संसद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को चीख चीख कर गालियां दी गई थीं, तो इस सम्मेलन में सुभाषचंद्र बोस को पहला प्रधानमंत्री बनाने की मांग करके गांधी और नेहरू को नीचा दिखाने का पुराना दुष्प्रयास दोहराया गया है।

दुर्भाग्य है कि न कोई संत और न संतों का चहेता महापुरुष इस काबिल है, जिसे इतिहास के किसी कोने में टिकाया जा सके। खाली जगह भरने के लिए सुभाष और पटेल इनके आरक्षित महापुरुष हैं। स्क्रीन सेवर हैं।

धर्म संसद से इस सम्मेलन का तारतम्य दो बातों से साफ है। पहला यति नरसिंहानंद को हिंदूराष्ट्र के स्वाधीनता सेनानी की तरह रिहा कराने की कसरत। दूसरा संसदीय प्रतिनिधियों के नाम को धर्म सांसद कहने की मांग करना।
यह धर्म संसद अग्रतर भाग होने की सीधे स्वीकारोक्ति है। क्योंकि संस्कृत में स्त्रीलिंग ’संसद्’ शब्द से ही सांसद शब्द की व्युत्पत्ति की गई है। सांसदों का स्थान होने से इसे संसद नहीं कहा गया, बल्कि संसद का प्रतिनिधि होने के कारण सदस्यों को ’सांसद’ पुकारा गया। फिर इनके स्वप्नलोक का सांसद भी धर्म सांसद होना ही चाहिए।‌

जहां तक हिंदूराष्ट्र होने का विषय है, विश्व में संविधान के द्वारा एक भी हिंदूराष्ट्र होने का उल्लेख नहीं मिलता और भारत में भी अनेक रियासतों के नाम पर राष्ट्र की ऐतिहासिक और भौगोलिक चर्चा है। हिंदूराष्ट्र का कोई वर्णन नहीं है। भगवान राम और कृष्ण के समय में भी हिंदूराष्ट्र का होना उल्लिखित नहीं है।

अपने संविधान में जिन धर्मग्रंथों की चर्चा कर रहे हैं उनमें मनुस्मृति का भी नाम है। फिर संत सम्मेलन को यह बताना चाहिए कि ‌चारों वर्णों का अधिकार उन्हें किस रूप में मिलेगा। मनुस्मृति को जलाकर जो एक बड़ा समुदाय या तो बौद्ध हो गया है या नाम मात्र का हिंदू बचा हुआ है, इस हिंदूराष्ट्र के निर्माण में मुसलमान भले ही चुप रहे, पहली बगावत तो वही करेगा।
हर कदम पर जिन सिखों को अपमानित किया जाता है, क्या वे सपने में भी किसी हिंदूराष्ट्र के लिए सहमत हो पाएंगे? मनुस्मृति के अनुसार द्विजेतर वर्ण के लिए क्या शिक्षा फिर से निषिद्ध कर दी जाएगी?

पिछड़े वर्ग के लोग गेरुआ पहनकर संत तो बन सकते हैं लेकिन वह भारतीय संविधान के फायदे छोड़कर कथित संतो के कथित हिंदूराष्ट्र का नागरिक बनने के लिए तैयार होंगे? आपके हिंदूराष्ट्र के प्रस्ताव पर देश भर की सैकड़ों राजनीतिक पार्टियों में रहने वाला हिंदू जिसपर गंगा नहाने, तिलक लगाने, मंदिर जाने और जनेऊ पहनने पर तंज कसे जाते हैं, वह इन कथित संतों के हिंदूराष्ट्र को फूटी आंख से भी देखेगा? यह सब कुछ सर्वथा असंभव और अव्यावहारिक प्रलाप है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और किसी हद तक अंबेडकर जी ने जिस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रचना को स्वीकार किया था, उसमें गेरुआधारी नहीं थे, लेकिन सनातन धर्म का सार–स्वरस उसी में विद्यमान था। दया, करुणा, समता, ममता और जनता को ही जनार्दन मानकर जो राष्ट्रधर्म बनाया गया, उसमें धर्म का वास्तविक सत्व और सुगंध विद्यमान है।

इनका धर्म संतरा और मुसम्मी का पेड़ है तो गांधी का धर्म उसका रस है जिसमें न फल दिखाई पड़ता है न वृक्ष दिखाई पड़ता है। ना उसके दिखाने का आडंबर ही है, लेकिन उसका पोषक तत्व मानव कल्याण के लिए निरंतर सुलभ होता है।
गीता, रामायण पर आधारित हिंदूराष्ट्र के संविधान की घोषणा करनी आसान है, पर गीता रामायण में संतो के लिए जगह जगह जो मानक प्रस्तुत किए गए हैं, क्या संत सम्मेलन का एक भी संत रामचरितमानस के ’संत’ की कसौटी पर अपने आप को उपयुक्त पाता है? कोई चुनौती दे तो मैं सारे उदाहरण प्रस्तुत करूंगा। गीता से भी और रामचरितमानस से भी।

इनका हिंदूराष्ट्र रावण के हिंदूराष्ट्र जैसा है, जिसमें घर किसी के पास नहीं है, सब मंदिर में निवास करते हैं बड़े बड़े मंदिर हैं। लेकिन मंदिरों में मिलिटेंट रहते हैं। आतंकवादी रहते हैं।

इसलिए हनुमान जी ने सबसे पहले लंका में प्रवेश करते ही मंदिरों की छानबीन की।

मंदिर मंदिर प्रति कर सोधा।
देखे जहं तहं अतुलित जोधा।।

सारे मंदिरों को खंगाला उन्होंने और देखा कि कितना दुराचार वहां हो रहा है। हनुमान जी को आश्चर्य हुआ कि धर्म की यह दुर्दशा?

धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज कहा करते थे कि हमें हिंदूराष्ट्र नहीं चाहिए। हिंदूराष्ट्र तो रावण का भी था। हमें रामराज्य चाहिए। जहां कोई भेद न हो, विषमता न हो, न नफरत हो।
रावण के मन्दिरों में राम से लड़ने की व्यवस्था की गई थी। यज्ञ हवन पूजन इसीलिए चल रहे थे।

एक दृष्टि से यह धर्म संसद और संत सम्मेलन रोती–कराहती जनता को थपकी देकर सुलाने की घृणित चेष्टा है। जिसमें प्रत्यक्ष और परोक्ष दो शक्तियां काम कर रही हैं। जैसे बच्चे को सुलाते समय माता कहती है, सो जा बच्चे! तुम्हारे लिए चंदामामा ले आऊंगी, चांद सी दुल्हनिया ले आऊंगी, तुम्हारे लिए सोने का महल बनाऊंगी और न जाने क्या-क्या करूंगी?

लेकिन यह चीजें बस कहने की होती हैं। करने की नहीं। जब बच्चा सो जाता है तो यह कहानी खत्म हो जाती है। इसको सही शब्दों में जल्पना कहते हैं। चुनाव बीतते ही हिंदूराष्ट्र का संविधान संतो के अंत:पुर में सो जाएगा।

प्राइमरी स्कूल में मैंने एक गीत पढ़ा था।

यदि होता किन्नर नरेश मैं
राज महल में रहता,
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।

सूरज के रथ-सा मेरा रथ
आगे बढ़ता जाता;
बड़े गर्व से अपना वैभव
निरख-निरख सुख पाता।

यह जल्पना और कल्पना पर आधारित हिंदूराष्ट्र है। सब हिंदू एक हो जाएंगे, मुसलमानों को निकाल देंगे या उन्हें पालतू पशु की तरह प्यार से खाना खिलाते रहेंगे। उनके लिए शौचालय, मूत्रालय आवास बनाते रहेंगे। वोट नहीं देने देंगे। और हम सब लोग जो संत सम्मेलन कर रहे हैं ’धर्म सांसद’ बन कर के सेंट्रल विस्टा में धूनी रमाएंगे।

यह सब तो बाद में होगा। अब संतों की परीक्षा होनी चाहिए कि‌ चपरासी क्लर्क बनने के लिए भी कुछ शिक्षा की आवश्यकता होती है, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, ड्राइवर, मैकेनिक सबकी कोई न कोई योग्यता निर्धारित होती है। लेकिन यह हमारे हिंदूराष्ट्र का कितना बड़ा अपमान है कोई भी सौ डेढ़ सौ रुपए का गेरुआ वस्त्र लेकर रातों-रात साधु बन जाता है फिर वह कैसा भी प्रलाप करने के लिए स्वतंत्र होता है।

इसी हिंदू आंदोलन और हिंदू महासभा के कारण 1947 में देश दो भागों में बंटा। हालांकि ऐसा स्वप्न में भी सोचा नहीं जा सकता, भारत का जनतंत्र बहुत मजबूत है, लेकिन इनकी गतिविधियां देख कर लगता है कि यह देश में 1947 को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं और धर्म के नाम पर यदि इसी तरह सत्ता का भोग करते रहे और नफरत की फसल उगाते रहे तो फिर से देश का बंटवारा होगा और इनका यही प्रयास मुसलमानों को दो और नए पाकिस्तान मांगने के लिए मौका प्रदान करेगा?

इन कथित संतों ने अपनी और धर्म के प्रतीकों की ऐसी दुर्दशा कर रखी है और धर्म को इस तरह दांव पर लगा रखा है कि यही समाज आने वाले समय में संतों के खिलाफ बगावत करेगा और धर्म में प्रवृत्त होने की बजाए लोग धर्म से दूरी बनाकर रहेंगे।
धर्म इस समय मोटा ताजा और स्वस्थ नजर आ रहा है, वह जलोदर के उस मरीज जैसा है, जो बीमारी के कारण भरा पूरा और स्थूल नजर आता है लेकिन उसके भीतर मौत पल रही होती है।

(लेखक प्रतिष्ठित भागवत कथावाचक और चिंतक हैं।)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
.site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}