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देश अब तानाशाही के स्वागत के लिये तैयार है…!

देश अब तानाशाही के स्वागत के लिये तैयार है…!

!ताकि सनद रहे!

० क्योंकि सत्ता को ‘टू मच डेमोक्रेसी’ अखर रही है
० तानाशाही के फ़ायदे गिनाने वाली भीड़ मुस्तैद है
० राष्ट्रवाद का दुशाला ओढ़ कर तानाशाही देहरी पर है

० डॉ राकेश पाठक
प्रधान संपादक

फ़ोटो: गूगल से साभार

क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी उम्र पूरी कर रहा है??
क्या अब ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक पंथ निरपेक्ष गणराज्य’ में से ‘लोकतंत्र’ को विलोपित करने का समय आ गया है?
हो सकता है आपको यह अभी दूर की कौड़ी लगता हो लेकिन चौकन्ने कानों से सुनना चाहें तो तानाशाही की पदचाप सुनाई देने लगी है। भीड़ के भौकाल के पीछे उठ रही तानाशाही की आंधी के बगूले दिखने लगे हैं। ‘राष्ट्रवाद’ की कढ़ाई वाला दुशाला ओढ़ कर तानाशाही आपकी देहरी पर आ पहुंची है।

उससे भी बड़ी बात यह है कि देश में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग मौज़ूद हैं जो तानाशाही के स्वागत, वंदन, अभिनंदन के लिये तैयार दिख रहे हैं। तानाशाही के इस्तक़बाल के लिये बौराई हुई भीड़ झांझ-मजीरे, ढोलक-खड़ताल, तुरही-दुंदुभी लेकर बस एक इशारे की प्रतीक्षा में है।
हां, अगर आप तानाशाही की पदचाप न सुनना चाहें और धूल भरी आंधी न देखना चाहें तो ‘शुतुरमुर्ग’ बने रहने से कौन रोक सकता है??

० #पांचसालपहलेआडवाणीनेआगाहकिया_था

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के ‘टू मच डेमोक्रेसी’ वाले हालिया बयान की मीमांसा से पहले थोड़ा पीछे लौट कर 2015 में लालकृष्ण आडवाणी बयान को याद कर लेना बेहतर होगा।
बीते जमाने के तथाकथित लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने तब कहा था कि-
“मैं इमरजेंसी की आशंका से इनकार नहीं करता…। ऐसी ताकतें मज़बूत हुईं हैं जो संवैधानिक संस्थाओं को दबा सकतीं हैं।”
आडवाणी के बयान पर तब थोड़ी बहुत हाय-तौबा हुई और फिर समय की धूल में वे और उनका बयान धूसरित हो गये।
( ‘इमरजेंसी का रोमांटिसिज़्म और हम’ शीर्षक से हमने इस पर 25 जून 2015 को लिखा भी है जो हमारी फ़ेसबुक वॉल पर है।)
और हां हम इमरजेंसी के विरोधी थे,हैं और रहेंगे।

लेकिन लालकृष्ण आडवाणी का कहा एक तज़ुर्बेकार राजनेता की दूरंदेशी तो थी ही। वे 2015 में जो देख रहे थे वो आने वाले सालों में हक़ीक़त में बदलते देश-दुनिया ने देखा ही है।
ज़माने ने देखा है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये प्रधान सेवक कैसे ‘एकतांत्रिक’, सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, ईश्वरीय अवतार में बदल गए। मंत्री, मुख्यमंत्री उन्हें भगवान विष्णु का अवतार,साक्षात भगवान राम और देवताओं के भी राजा
कहने,बताने में होड़ कर रहे हैं।
(देवकांत बरुआ का जुमला- इंदिरा इज़ इंडिया इनके सामने टुईंयां जैसा है।)

० #संवैधानिकसंस्थाएंचौपटऔरहमफैंसीड्रेसमेंमगन

देश-दुनिया ने देखा कि कैसे भारत में सभी संवैधानिक संस्थाएं सत्ता की चेरी, बांदी, रक्कासा, कठपुतली बनती चली गईं। लोकतंत्र का चौथा खंबा सत्ता के चारण-भाट में बदल कर ‘मोदी-रासो’ जैसे विरुद लिख लिख कर धन्य होता रहा।
चुनाव आयोग से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक के मुंह पर ‘मुसीका’ बांध दिया गया है। बड़ी से बड़ी जांच एजेंसी को सत्ता के बाड़े में खूंटे से बांध कर पालतू टॉमी, शेरू बना दिया गया और लोग तालियां बजाते रहे।
इन्हें जिस पर चाहा ‘छू’ कर दिया जाता है।

सरकार की गुल्लक का हिसाब रखने वाले, कागज़-पत्तर की पड़ताल करने वाले सीएजी, सीवीसी, सीआईसी जैसे ओहदों की औक़ात मीर-मुंशी, मीर-मुनीम जैसी बौनी बना दी गई और आप हर दिन बदलती रंग बिरंगी पोशाकों की फैंसी ड्रेस पर किलकारी भरते रहे।

चुनी हुई सरकारों को गिरा-गिरा कर दूसरे दलों को ‘बधिया’ कर दिया गया। सत्ता के सोमरस और अंधभक्ति की अफ़ीम की पिन्नक में डूबे भक्तों की अक्षोहिणी ट्रोल सेनाएं निर्लज्जता से इस ‘दिगम्बर-नृत्य’ पर अट्टहास कर तुमुल कोलाहल करती रहीं।

प्रधान सेवक ने देश, जनता को बुरी तरह हिला देने वाले फ़ैसले करते वक्त झूठे मुंह भी अपनी राजसभा के मंसबदारों से मंत्रणा करना ज़रूरी नहीं समझा। इसके उलट ‘मास्टर स्ट्रोक’ बता-बता कर अकेले फ़ैसला लेने के मनमाने तौर-तरीके पर झूम का नाचा-गाया गया।

नोटबन्दी से लेकर बिना तैयारी के लॉक डाउन तक बड़े से बड़े फ़ैसले सत्ता के शिखर पर सिंहासनारूढ़ ‘देवताओं के भी राजा’ ने ‘अहम ब्रह्मास्मि’ के भाव से लिये और देश के सिर पर ‘कृपा’ की तरह बरसा दिये।

शासन-सत्ता और सत्ता के मुखिया से असहमति, विरोध, प्रतिरोध, जन-आंदोलन, धरना, प्रदर्शन सब देशद्रोह बना दिया गया है।
हर असहमत व्यक्ति, संस्था, संगठन, दल अब देशद्रोही, पाकिस्तानी, मुल्ला, खालिस्तानी, नक्सल, अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग का घोषित नुमाइंदा है।

और सत्ता की इस निरंकुशता, मनमानी पर मुदित मन होकर भांगड़ा, भरत नाट्यम, कुचिपुड़ी करने वाली भीड़ की पीठ पर ख़ुद सत्ता साकेत का लंबा हाथ है जो कानून के हाथ से ग़ज़ भर बड़ा ही है।
झूठ, फरेब, पाखण्ड की पताका चतुर्दिक फहराने वाले आइटी सेल और ट्रोल आर्मी को ‘मक्खन-मिश्री’ खिलाने वाले हाथ-तश्तरी सब इसी सत्ता के हैं।
यही भीड़ है जो तानाशाही के स्वागत, द्वाराचार के लिये वंदनवार बांध कर, हार-फूल लिये, गले में गमछा डाले बेसब्री से एक पांव पर खड़ी है।

० #बड़ेबाबूकेपेटमेंटूमचडेमोक्रेसीकी_पीर

अब नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के बयान की पड़ताल कर लीजिये।
रीढ़हीन बड़े बाबुओं की फौज़ के एक मौकापरस्त नुमाइंदे अमिताभ कांत को पीर हो रही है कि “भारत में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है (टू मच डेमोक्रेसी)।
इस टू मच डेमोक्रेसी के कारण कड़े और बड़े सुधार नहीं हो पा रहे..
और देश चीन के साथ मुक़ाबला नहीं कर पा रहा।”

नम्बर एक- भूल जाइये कि यह अकेले अमिताभ कांत की पीर है…असल में यह सत्ता के शिखर पर विराजमान ‘अवतार’ और उनके पूरे उपासक कुल की पीर है कि अब भी कुछ लोग बच कैसे गए जिनके हलक में जुबान है, जो सवाल पूछते हैं, जो झंडे-बैनर लेकर सड़क पर उतर आते हैं..?
दूसरी बात- यह सत्ता की प्रयोगशाला का ‘लिटमस पेपर’ या उससे भी आगे ‘सोडियम रिंग टेस्ट’ ही है। यह जानने के लिये कि देश का मानस अब चीन जैसी तानाशाही के लिये कितना तैयार है…? कोई कोर कसर बाक़ी तो नहीं??

तीसरी बात- बड़े बाबू अमिताभ कांत किस तरह के कड़े सुधार का सपना देख रहे हैं??
क्या पिछले छह साल में एक भी कड़ा कदम है जिसे लागू करने में सरकार को राई रत्ती भी संकोच हुआ हो??
नोटबन्दी, जीएसटी, श्रम कानून, कृषि कानून, लॉक डाउन, बैंकों का भट्टा बिठाने में किसने कब रोका??
देश और लोगों के भले के बहाने आपने जो चाहा सो किया तो फिर कड़े सुधार न कर पाने को रुदाली क्यों???

चौथी बात- एक अदना नौकरशाह चीन जैसे तंत्र की हिमायत कर रहा है और लोकतांत्रिक सत्ता का शिखर गुड़ खाये बैठा है..!
क्या भारत में सचमुच चीन जैसा एकदलीय शासन चाहिये अमिताभ कांत या उनके ख़ुदा, उनके भगवान को..?
क्या वे शी जिन पिंग की तरह नरेंद्र दामोदरदास मोदी को आजीवन प्रधानमंत्री बने रहने का दिव्य दिवा स्वप्न देख और दिखा रहे हैं??

तो क्या अमिताभ कांत और उनके सरपरस्तों का आदर्श राष्ट्र राज्य चीन और उसकी शासन प्रणाली है??
अगर नहीं तो एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य में ऐसे लोकतंत्र विरोधी घुन-दीमक को इतनी बड़ी कुर्सी पर अब तक नहीं होना चाहिए था।

अमिताभ कांत जैसा नौकरशाह अपने आराध्य की छवि को मन में बसा कर आरती करते वक्त भूल जाता है कि यह ‘टू मच डेमोक्रेसी’ ही है जिसने उसे इतने ऊंचे ‘चौंतरे’ पर बैठने का मौका दिया है। उस पर पसर कर लोकतंत्र को गरियाने का मौका भी इसी टू मच डेमोक्रेसी ने ही दिया है।
समझे बड़े बाबू..!

० #डिक्टेटरशिपकायूटोपियाऔरहमारा_समय

हमारे देश के मानस के किसी अंधेरे कोने में तानाशाही को लेकर एक अज़ीब ख़्वाब हमेशा से सोया रहा है।
आज़ादी के बाद अब तक यह मुहावरा लोगों की जुबान में गाहे-बगाहे आता जाता रहा है कि ‘एक बार एक डिक्टेटर आ जाये तो ये देश ठीक हो जाएगा।’

यहां तक कि इंदिरा गांधी के थोपे आपातकाल को तब भी सराहने वाले मौजूद थे और अब भी क़सीदे काढ़ने वाले मिल ही जाते हैं।
कुछ साल पहले जब नेता जी सुभाषचंद्र बोस की फाइलें खुलीं थीं तब मालूम हुआ कि नेता जी आज़ादी के बाद एक-दो दशक तक डिक्टेटरशिप के हिमायती थे।
तब इसी भीड़ ने नेता जी के विचार को खूब उछाला था।

लगता है अब समय आ गया है जब मध्यम वर्गीय खाये-अघाये, अफरे बैठे लोगों को अपना सोया हुआ स्वप्न साकार होते लग रहा है। यही लोग कालीन बिछा कर तानाशाही के स्वागत के लिये उतावले बैठे हैं।

लेकिन डिक्टेटरशिप के यूटोपिया में डूबती-उतराती भीड़ भूल जाती है कि दुनिया के इतिहास में हर तानाशाह अंततः मानवता और लोकतंत्र का दुश्मन बन कर ही विदा हुआ है।
लेकिन तानाशाह विदा होने से पहले इतने ज़ख्म दे जाता है कि उसके खुरंट के भीतर से कई पीढ़ियों तक ख़ून रिसता रहता है।

ये आपको तय करना है कि तानाशाही के स्वागत में बिछे जाजम के दोनों तरफ़ हाथ जोड़ कर खड़े रहना है या लोकतंत्र बचाने के लिये मुट्ठियाँ तान कर आवाज़ बुलंद करके नारा लगाना है… लोकतंत्र ज़िंदाबाद।

मर्ज़ी है आपकी…क्योंकि देश है आपका।

इति।

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