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साबित कीजिये कि ये सड़क वालों की भी सरकार है!

▪देश की जनता ने गुनाह नहीं किया है कि सड़क पर भटके
▪हेल्थ इमर्जेंसी जान बचाने के लिये है ज्यादती के लिये नहीं

• अमृता राय

मध्यप्रदेश के दतिया में सोनू नाम के एक युवक की गुरूवार को मौत हो गई। उसके पिता रामस्वरूप कुशवाह थाना थरेट क्षेत्र के सुलोचनपुरा के निवासी हैं। स्थानीय अखबार नई दुनिया की खबर कहती है कि ये मौत भूख और प्यास से हुई है। अखबार ये भी कहता है कि कुछ लोग सोनू नाम के युवक को गाड़ी में लाकर भगवानपुरा तिराहे पर छोड़ गए थे। स्थानीय लोगों ने शायद संवाददाता को बताया और उसने अपनी खबर में लिखा कि ये युवक आसपास से गुजरनेवालों से इशारे से खाना-पानी मांग रहा था।  
प्रशासन वाजिब वजह की तलाश में है कि इस मौत को क्या करार दिया जाए, ये मौत भूख से है… बीमारी से है…कोरोना से है… या फिर किसी अन्य वजह से। हो सकता है ये मौत महज इत्तेफाक हो… या किसी अन्य बीमारी से भी हुई हो, लेकिन इस सच को कैसे झुठलाया जा सकता है कि वो शख्स मरने से पहले दवा इलाज नहीं करा सका…और सड़क पर छोड़ दिया गया।
बीते तीन-चार दिनों से हमारे देश की सड़कें ऐसे ही वाकयों की गवाह बन रही है, जहां हाशिए के लोगों को सरकार और समाज ने सड़क पर छोड़ दिया है। सोनू ने संसार छोड़ दिया… लेकिन लाखों ऐसे हैं जो अपने सपनों की गठरी उठाए पैदल चले जा रहे हैं। उनके हाथों में कभी नन्ही उंगलियां छूटती हैं कभी सिमटती है…। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों में जिन्दगी कभी कंधों पर झूलती तो कभी हाथ से छूटती दिखाई दे रही है। कठिन रास्ता, हज़ारों किलोमीटर का सफर, हर तरफ मौत का भय, मगर कोई भी रुकना नहीं चाहता। 
ये हालात इसलिए बने हैं क्योंकि कोरोना से देश को बचाने के लिए 24 मार्च की आधी रात को अचानक सरकार ने कर्फ्यू लगा दिया। यातायात बंद करवा दिया गया और रेल, बस और हवाई सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गई। मानो ये ज्यादती काफी नहीं थी कि पुलिस ने भी तत्काल मोर्चा संभाल लिया और सड़कों पर बेबस जनता को डराने, धमकाने और पीटने पर उतारू हो गई। कहीं मुर्गा तो कहीं मेंढक बनाए जाने की तस्वीरें जीवन बचाने की प्रधानमंत्री की लड़ाई को कमजोर करने लगीं। 
असंवेदनशीलता की हद तो तब हो गई जब खुद नेताओं की तरफ से कर्फ्यू का उल्लंघन करनेवालों को गोली मारने की वकालत की जाने लगी।
सवाल उठता है कि हम मानवता को बचाने की लड़ाई लड़ते-लड़ते अचानक इस राह पर कैसे आ गए…? पुलिस ने ये क्यों मान लिया कि अब उसके पास अकूत शक्ति आ गई है कुछ भी करने की। सड़कों पर डटी पुलिस को ये अधिकार और हौसला कहां से मिलने लगा कि वो रास्ते के मजबूर लोगों का मुकाबला हिंसा से करने लगी…? हमारे देश में इमरजेंसी नहीं नागरिक कर्फ्यू है और इसे देश की जनता की सहमति से लगाया गया है। उनके ऊपर अत्याचार करने के अधिकार के तहत नहीं…। सत्ता को एक पुलिस स्टेट की तरह व्यवहार करने से बचना चाहिए।  
मशहूर वकील वृंदा ग्रोवर का कहना है कि ‘देश की जनता ने कोई गुनाह नहीं किया है कि उसे घरों में कैद होने की कोई सजा मिली है। और ना ही हम किसी गुनाहगार की तरह 21 दिनों के हाउस अरेस्ट में हैं। इस मौके पर पुलिस का काम लोगों की मदद करने और उनका विश्वास कायम करने का है…। पुलिस लोगों को पीटने और शर्मिंदा करने का काम क्यों कर रही है…? वृंदा ग्रोवर मांग करती हैं कि ऐसे सभी पुलिस वालों को सस्पेंड कर देना चाहिए जो इस हेल्थ इमरजेंसी के दौरान अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। 
सवाल यही है कि राज्य और केन्द्र सरकारों की तरफ से पुलिस को आखिर क्या निर्देश दिए जा रहे हैं? क्या ये हेल्थ इमरजेंसी लोगों की जान बचाने के लिए है या लोगों के साथ ज्यादती के लिए? अच्छा ना होता अगर इस लॉक डाउन में पुलिस सड़क पर उतरे इन गरीबों को घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाती..लोगों को जरूरी सुविधाएं मुहैय्या कराने में मदद करती…?
महानगरों से आ रही पलायन की तस्वीरों ने सबको विचलित किया है।  निश्चित तौर पर सरकारों को भी इससे परेशानी हो रही है। लेकिन जहां केन्द्र सरकार को आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए थी, वहां वो राज्यों से कह रही है कि आप पलायन रोकें और उस पर काबू करें…। अच्छा तो होता कि प्रधानमंत्री रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान ही ये ऐलान कर दिए होते कि सभी लोग अपने अपने घरों को चले जाएं और पलायन करनेवाले मजदूर वर्ग को जाने के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई गई होतीं।  
अब ये सरकार को साबित करना है कि वो सिर्फ बालकनी वालों की सरकार नहीं है जो ताली और थाली आपके कहने से पीटेंगे बल्कि उनकी भी है जो हर कठिन वक्त पर आपके सिपाही बनकर देश का बोझ ढ़ोते हैं, देश के लिए लड़ते हैं। पलायन के लिए मजबूर नागरिकों की जिम्मेदारी राज्यों को उठाने का संदेश देना भी गृहमंत्री की असंवेदशीलता मे ही गिना जाएगा। क्या ये राज्य और केंद्र दोनों सरकारों की मिली जुली जिम्मेदारी नहीं है…?
कहां तो जनता को ये उम्मीद थी कि इस कठिन वक्त में सरकार जनता से रोजाना मन की बात करेगी, अपडेट करेगी कि उसने केन्द्रीय और राज्यों के स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्या क्या कदम उठाए हैं… कहां उसे बंदी में छोड़कर सरकारें पुलिस स्टेट बनने लगी हैं। हेल्थ इमरजेंसी कोई जेल तो नहीं कि जनता उसे सजा की तरह भोगे।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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