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■ कोयले के कारोबार में गुजरात की कंपनियां कर रहीं काला खेल..!

◆ लघु उद्योगों के लिये आवंटित कोयला
बेजा तरीक़े से काले बाज़ार में बेच रहीं।

० डॉ राकेश पाठक

दिल्ली/भोपाल.
देश में कोयले के उत्पादन, वितरण करने वाली नियामक संस्था कोल इंडिया की नाक के नीचे कोयले के कारोबार में बहुत बड़ा काला पीला चल रहा है।
लघु उद्योगों के लिये आवंटित कोयला गुजरात की तीन एजेंसियां ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से कोयले को काले बाज़ार में बेच कर करोड़ों का वारा न्यारा कर रहीं हैं। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्रालय भी इस काले खेल पर आंख मीचे बैठा है।


● इस तरह हो रही है काला बाज़ारी

देश भर में लघु उद्योगों को कोयला प्रदाय करने के बारे में भारत सरकार ने विधिवत नीति निर्धारित की हुई है।
रियायती दर पर लघु उद्योगों को कोयला उपलब्ध करवाने की नीति के तहत ‘कोल इंडिया’ से राज्यों को कोयला आवंटित होता है और उसके बाद राज्य द्वारा नियुक्त एजेंसी इसका आगे वितरण करती है।
मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि राज्यों ने अपने अपने राज्य की किसी सरकारी एजेंसी को यह ज़िम्मेदारी दी है। जैसे मध्यप्रदेश में लघु उद्योग निगम यह दायित्व निभाता है।छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सरकारों ने भी यह जिम्मेदारी अपने सरकारी विभागों को ही दे रखी है।
अन्य राज्यों के उलट गुजरात सरकार ने तीन प्रायवेट एजेंसियों को कोयला वितरण का ठेका दे रखा है।
इन एजेंसियों के नाम हैं-
काठियावाड़ कोल एंड कोक कंज्यूमर्स एसोसिएशन, द गुजरात कोल कोक ट्रेडर्स एंड कंज्यूमर्स एसोसिएशन और साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज़।
गुजरात की तीन एजेंसियों के साथ कोल इंडिया की कंपनियों साउथ साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और बेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड ने फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट (FSA)किया हुआ है।

★ गुजरात न जाकर मप्र, छग में बिक जाता है कोयला
गुजरात की एजेंसियां एसईसीएल और डब्लूसीएल की मप्र ,छत्तीसगढ़ की शहडोल,सारिणी, रेहट, अमलाई, शारदा, जगन्नाथपुर ,दिपका,नागपुर आदि खदानों से कोयला उठाती हैं।
क़ायदे से इन एजेंसियों को कोल कम्पनियों से कोयला उठा कर गुजरात के लघु उद्योंगों को उपलब्ध करवाना है।
लेकिन ये एजेंसियां कोयला उठाने और गुजरात ले जाने के बजाय सीधे मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के ट्रेडर्स को बेच रहीं हैं। हद ये है कि ये ट्रेडर्स भी गुजरात के न होकर मप्र,छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि के हैं जो कि अपने ही राज्य में इस कोयले को बेजा तरीके से बेच देते हैं।

कोयला कंपनियां से डिलीवर ऑर्डर ( DO) तो गुजरात की एजेंसीज के नाम से ही जारी होते हैं लेकिन कोयला गुजरात पहुँचता ही नहीं है।

गुजरात में लघु उद्योगों तक ये कोयला पहुंचता ही नहीं है। गुजरात सरकार ने अपने द्वारा नियुक्त एजंसियां के बारे में न तो स्थानीय उद्योंगों को अवगत कराया न ही इस बारे में कोई नीति निर्धारित की।

कोयला कंपनियों की खदानों से एजेंसी गुजरात के लिये बने गेट पास पर माल उठाती है लेकिन गेट से बाहर आने के बाद माल मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि ट्रेडर के ठिकाने पर खप जाता है।

★ कीमत के खेल भी समझ लीजिये..

कोल इंडिया द्वारा कोयले की सप्लाई के लिये कीमतों को नोटिफाई किया जाता है।
सेना, राज्यों के बिजली घर और लघु उद्योगों के लिये एक निश्चित कीमत तय है। जो कि सभी टैक्स सहित लगभग 2800 से 3200 रु प्रति टन तक होती है। इसे रियायती दर कहा जाता है।

अन्य किसी को ट्रेडर, फैक्ट्री या व्यापारी सिर्फ़ ई-ऑक्शन (ऑनलाइन नीलामी) के जरिये ही कोयला खरीद सकते हैं। आम तौर पर
ई-ऑक्शन में कोयला लगभग 11 हज़ार रु प्रति टन क़ीमत पर मिलता है।

जो ट्रेडर गुजरात की एजंसी से 2800 या तीन हज़ार प्रति टन का कोयला नियम विरुद्ध तरीक़े से उठाते हैं वे इसे खुले बाज़ार में 9 या दस हज़ार रु प्रति टन के भाव में बेच देते हैं।

★ क्या कहते हैं कारोबारी..

मप्र के कोयला कारोबारी कमल नागपाल कहते हैं कि यह बहुत बड़ा घोटाला है। लघु उद्योगों के लिये आने वाला कोयला जिस राज्य के लिये आवंटित होता है उसके बाहर जा ही नहीं सकता लेकिन गुजरात की निजी एजेंसियों द्वारा ये कोयला वहां पहुंचता ही नहीं है। जिस तरह रियायती दर वाला कोयला काले बाज़ार में बेचा जा रहा है वह आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है।
नागपाल कहते हैं कि गुजरात की एजंसियां जिन खदानों से कोयला उठातीं हैं वहाँ के गेट पास के साथ निकले ट्रकों की पड़ताल करके ही यह पता लग सकता है कि कोयला अंततः किस ठिकाने पर ले जाया गया। नागपाल दावा करते हैं कि गुजरात की एजेंसियां कोयला न गुजरात लेकर जातीं हैं और न वहां के लघु उद्योगों तक यह पहुंचता है। इस खेल में करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं। नागपाल इसकी शिकायत केंद्रीय कोयला व खान मंत्री, कोल इंडिया आदि को कर रहे हैं।

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