देशसिनेमा

यह ‘थप्पड़’ समाज की दकियानूसी विचारधारा पर है

यह ‘थप्पड़’ समाज की दकियानूसी विचारधारा पर है !

●प्रदीप शर्मा

‘आर्टिकल—15’ के बाद अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘थप्पड़’ बड़े पर्दे पर आई । ‘थप्पड़’के जरिए फिल्मकार अनुभव सिन्हा ने भारतीय समाज में महिलाओं को लेकर स्थापित हो चुके दकियानुसी विचारों और पितृ सत्तात्कमक रिवाजो पर सही मायने में जोरदार थप्पड़ मारा है ।

पहले बात करेंगे कलाकारों के काम की , तो ‘पिंक’ फिल्म के बाद ताप्सी पुन्नु ‘थप्पड़’ मे ओर अधिक मझी हुई नजर आई । चेहरे की बुनावट, संवाद प्रेक्षण ने भारतीय गृहिणी के द्वंद को बखुबी चित्रित किया है । ‘पिंक’ में कोर्ट वाले क्लाइमेक्स सीन में जब वकील का किरदार कर रहे अमिताभ बच्चन अपने पक्षकार के बचाव में आकर जज को कहते है कि ‘ना’ का मतलब सिर्फ ‘ना’ होता है तब बचाव पक्ष के वकील को उसके प्रश्न का जवाब देते हुद दो—तीन मिनट के सीन में जो आत्मविश्वास तापसी अभिनित पात्र में दिखता है वैसा ही आत्मविश्वास ‘थप्पड़’ में आरंभ से अंत तक दिखाई देता है ।

युवा अभिनेता पवेल गुलाटी ने अमृता ( तापसी )के पति विक्रम के किरदार में है, इस पात्र को पवेल ने बगैर किसी अतिरेक के निभाया है । एक कामकाजी पुरुष की महत्वकांक्षा और इस बीच के कार्यालयीन तनाव को विक्रम झेलता हैं । आम जिन्दगी में भी विक्रम जैसे कई लोग मिल जाएंगे, जिनकी महत्वकांक्षा उन्हे इतनी आगे लेकर चली जाती है कि परिवार पीछे छूट जाता है । यहां भी विक्रम अपनी पत्नी अमृता ( तापसी ) को विदेश ले जाकर वही बसने के सपने दिखाता है । हां वो अपना यह सपना भी पूरा कर लेता है । पर तब तक अमृता और विक्रम के रिश्तों का दही फट चुका होता है ।

यहां रहीम को याद किया जा सकता है जो कहते है ”बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किनकोय…रहिमन फाटे दूध का, मथे ना माखन होई” । अमृता—विक्रम का रिश्ता बिखर चुका होता है । फिर आता हूं ‘थप्पड़’ पर , अनुभव ने थप्पड़ को संभ्रान्त परिवारों से गुजारते हुए मध्यवर्गीय परिवारों और फिर झोपड़ पटृटी तक लाकर छोड़ा है । तीनों ही स्तर पर अनुभव सिन्हा नारी की चार दीवारों के बीच घुटती सांसों को पर्दे पर लाने में कामयाब रहे । मध्यानंतर के बाद फिल्म कुछ धीमी—धीमी सी दिखती है, लेकिन संवाद और अमृता—विक्रम के परिवारों की लाचारियां और लोक लाज को दिखाना अनुभव ने शायद जरुरी समझा होगा, लिहाजा फिल्म की रफ्तार धीमे होने के बाद भी दर्शक बोर नहीं होता ।

यहां अमृता के पिता के मुंह से संवाद लेखक रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित पंक्तियां “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध” लाइन बुलवाता है । ये पक्तियां अमृता का पिता स्वयं और समाज दोनों को केन्द्र में रखते हुए तटस्था का विरोध करता है और अपनी बेटी के फैसलों को मूक बनकर मजबूती देता है ।

यहां यह उल्लेख करना जरुरी है कि कुछ साल पहले पाकिस्तान में एक फिल्म बनी थी, नाम था ”आखिरी स्टेशन ” । इसमे छह पाकिस्तानी महिलाओं की कहानी दिखाई गई है । ये सभी महिलाएं लाहोर से कराची के लिए ट्रेन में बैठती है । बीच सफर में सभी अपनी—अपनी प्रताड़ना की दासतां बयां करती है । जब सभी अपना दर्द बयां कर चुकी होती है तब तब कराची स्टेशन आ जाता है ।

‘थप्पड़’ में भी अनुभव सिन्हा छह महिलाओं की कहानी बुनते हुए दिख रहे है । एक महिला बहुत बड़ी वकील है लेकिन पति उसकी कामयाबी में साथ नहीं है । लिहाजा वो अपनी कामयाबी अपने पुराने प्रेमी के साथ साझा करने के लिए मजबूर है । एक कामयाब बिजनेस मेन है लेकिन पति की मौत होने के बाद दूसरी शादी नहीं करती है ।

एक महिला अमृता की मां है जो घर—गृहस्ती के चलते अपने सपने का कत्ल करती है ,तो दूसरी महिला अमृता की सास है जो शादी के बाद अपने बिजनेसमेन पति के साथ कभी बैठकर चाय तक नहीं पी सकी और बूढ़ी हो गई । एक सुनिता नाम की काम वाली बाई है जिसे रात में उसका पति शराब पीकर रोज मारता है । वो कहती है ‘अगर मैं अपने पति का विरोध करुं और वो रात में मुझे घर से निकाल दे तो मैं कहां जाउंगी’ ये विचार सुनिता जैसी हजारों भारतीय महिलाओं के जहन में गहरे तक जमा हुआ है ।

फिर लौटता हूं अमृता और विक्रम के रिश्तों में आई दरार पर । फिल्म में विक्रम को जब ये खबर मिलती है कि कंपनी उसे सीईओ बनाकर विदेश भेज रही है तो विक्रम के घर शानदार पार्टी होती है । पार्टी के बीच में ही उसका साथी कर्मचारी सूचना देता है कि बॉस ने सीईओ की पोस्ट लंदन के किसी गोरे को दे दी है । इस दौरान पार्टी में ही मौजूद कंपनी के सिनियर के साथ विक्रम की बहस होती है । इस बीच अमृता बीच में आकर कुछ कहना चाहती है लेकिन उसकी बात सुने बगैर भरी महफिल में विक्रम , अमृता को जोरदार थप्पड़ मार देता है ।

बस इसी एक थप्पड़ से अमृता के स्वाभिमान, उसकी स्वतंत्रता और उसके अधिकारों पर ढकी धूल साफ हो जाती है । इसके बाद अमृता अपने पिता के घर आ जाती है जहां शुरु में तो मां उसे ससुराल भेजने की जिद पर अड़ी है तो सास कहती है कि पति है, क्या हुआ जो एक थप्पड़ मार दिया ! अमृता का जवाब” पर थप्पड़ नहीं मार सकता” बाकी तो आप पूरे परिवार के साथ बड़े पर्दे पर जाकर फिल्म देखें तो बेहतर होगा । आज की गला काट व्यावसयीक प्रतिस्पर्धा बॉलवूड में नई धारा का सिनेमा लाने का साहस अनुभव सिन्हा कर रहे है इसके लिए वे तारीफ के काबिल है ।

• प्रदीप शर्मा फिल्मकार एंव संवाद लेखक हैं ।

सेन्ट्रल इंडिया फिल्म एसोसिएशन (सीफा) के अध्यक्ष भी हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
.site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}