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पं गेंदालाल दीक्षित ने क्रांति के लिये बनाई सेना

जंगे आज़ादी में चंबल घाटी के सूरमा (भाग-2)

० चंबल के डकैतों को क्रांति की धारा में जोड़ा
० 1915 की बग़ावत के लिए सबसे बड़ी फौज़
० ग़दर पार्टी के नायकों से सिंगापुर तक संपर्क

// गतांक से आगे..

डॉ राकेश पाठक

पंडित गेंदालाल दीक्षित, ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद ने अपने गुप्त क्रांतिकारी संगठन ‘शिवाजी समिति’ और ‘मातृवेदी’ का बहुत योजनाबद्ध विस्तार कर लिया था। चंबल घाटी से लेकर अन्य प्रांतों तक इसके लड़ाका तैयार हो रहे थे।

मातृवेदी दल में बाक़ायदा विभाग बने थे जिनमें एक विभाग सशस्त्र सैन्य बल का विभाग था। इसके अलावा प्रकाशन और गुप्तचर विभाग भी थे।

रासबिहारी बोस आदि की 1915 की बग़ावत की योजना में गेंदालाल का ‘मातृवेदी’ दल सबसे बड़े सशस्त्र संगठन के रूप में शामिल होने वाला था लेकिन पंजाब में
समय से पहले भेद खुलने से यह बग़ावत परवान नहीं चढ़ सकी।
इसके बाद ही पहली बार अंग्रेजी हुक़ूमत को इस गुप्त क्रांतिकारी दल के बारे में भनक लगी।

क्रांतिकारी संगठन बनाने से पहले गेंदालाल कांग्रेस के प्रांतीय और राष्ट्रीय अधिवेशनों में शामिल हो आये थे। लेकिन उनका लक्ष्य सशस्त्र क्रांति के जरिये अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देना था।

‘शिवाजी समिति’ और ‘मातृवेदी’ दल के विस्तार के लिये गेंदालाल ने बंगाल,मुम्बई ,पंजाब आदि राज्यों तक यात्राएं कीं। इस दौरान रासबिहारी बोस और दूसरे विप्लवी नेताओं से उनका संपर्क हुआ।
कलकत्ता प्रवास के समय उन्होंने जर्मनी जाने की योजना बनाई। वे सिंगापुर तक पहुंच गए लेकिन तब तक प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया तो वापस लौटना पड़ा।

बंगाल,महाराष्ट्र,पंजाब, संयुक्त प्रांत के क्रांतिकारियों की योजना थी कि विश्वयुद्ध के समय ही 1857 जैसी बगावत कर दी जाए। रासबिहारी बीस,विष्णु गणेश पिंगले आदि के साथ गेंदालाल दीक्षित इस बग़ावत की योजना में शामिल थे।
बग़ावत की तारीख़ 21 फरवरी 1915 तय की गई थी।

गेंदालाल ने चंबल घाटी,राजस्थान और संयुक्त प्रांत में पूरी गोपनीयता के साथ अपना बड़ा सशस्त्र संगठन खड़ा कर लिया था। ग्वालियर, बनारस,शाहजहांपुर आदि में बंदूकें और अन्य हथियार बनवाए जाते थे। गेंदालाल बर्मा(वर्तमान म्यांमार) तक से हथियार लेकर आये।

०चंबल के डाकू भी क्रांतिकारी बन गए

इस दौर में चंबल घाटी में डाकुओं का भी बोलबाला था।
ये लोग ख़ुद को बागी कहते थे। गेंदालाल ने इन दस्यु गिरोहों को क्रांति की धारा में जोड़ने की कोशिश की। इस कोशिश में उस समय के सबसे बड़े दस्यु सरदार पंचम सिंह और मन्नू राजा को अपने साथ लाने में सफलता प्राप्त कर ली।
पंचम सिंह ग्वालियर रियासत के ‘गढ़’ का रहने वाला था और उसके गिरोह में 50 से ज्यादा हथियारबन्द लोग थे।
डाकुओं के गिरोह को राष्ट्रीय भावना समझाने का ज़िम्मा ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद को दिया गया। वे इन लोगों को घने जंगलों,बीहड़ों में क्रांति के बारे में समझाते थे।

मातृवेदी के सैन्य संगठन के कमांडर इन चीफ़ ख़ुद पंडित गेंदालाल दीक्षित बने, अध्यक्ष दस्युराज पंचम सिंह और मुख्य संगठनकर्ता बह्मचारी लक्ष्मणानंद को नियुक्त किया गया।
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल शाहजहांपुर में संगठन का काम देखते थे।

० 1915 की असफल क्रांति से हुआ खुलासा

देश भर के क्रांतिकारियों ने 1915 की 21 फरवरी को अंग्रेज छावनियों से बग़ावत की शुरुआत की योजना बनाई थी। रासबिहारी बोस इसे कुछ दिन आगे बढ़ाना चाहते थे क्योंकि बंगाल में क्रन्तिकारियों पर अंग्रेजों का दमन शुरू हो चुका था और संगठन तितर बितर था। लेकिन पंजाब के क्रांतिकारी तारीख़ आगे बढ़ाने को तैयार नहीं हुए।

दुर्भाग्य से पंजाब में क्रांति की तारीख़ से दो दिन पहले ही भेद खुल गया और उसी रात 64 क्रांतिकारी गिरफ़्तार कर लिए गए। इन पर केस चला और सबको फांसी दे दी गई।
क्रांति की विफलता से निराश रासबिहारी बोस कलकत्ता होते हुए जापान चले गए। विष्णु गणेश पिंगले को बनारस में पकड़ा गया और बाद में फांसी दे दी गयी।

गेंदालाल, ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद, देवनारायण भारतीय,रामप्रसाद बिस्मिल आदि ने इसी क्रांति में योगदान देने के लिये 5000 सैनिकों की पलटन तैयार कर ली थी। इसके अलावा राजस्थान के खारवा रियासत के राजकुमार को भी अपनी 10 हज़ार सैनिकों की सेना के साथ इस सैन्य विद्रोह में शामिल होने के लिए राजी कर लिया था।

इस बग़ावत का समय से पहले भेद खुलने से अंग्रेज हुक़ूमत के सामने शिवाजी समिति और मातृवेदी दल के बारे में खुलासा हो गया।
इसके बावज़ूद गेंदालाल दीक्षित और बिस्मिल आदि अंग्रेजों के हाथ नहीं आये।
गेंदालाल ने हिम्मत नहीं हारी और ‘ग़दर पार्टी’ के महानायकों से मिलने सिंगापुर,शंघाई तक यात्रा की। दीक्षित ने ग़दर पार्टी से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तालमेल किया। अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे गुप्त संगठनों से भी उनका संपर्क था।

रासबिहारी बोस ने बाद में ‘मातृवेदी’ के बारे में लिखा था कि- ‘संयुक्त प्रांत का संगठन सबसे उत्तम और सुगठित है।क्रांति के लिये जितने अच्छे ढंग से तैयारी इस दल ने की उतनी किसी ने नहीं की।’ ( जारी…)

अगले भाग में-

० मिहोना(भिंड) की ऐतिहासिक मुठभेड़ और गिरफ़्तारी
० मुठभेड़ में फिरंगियों के साथ थी सिंधिया की फोर्स
० ग्वालियर दुर्ग में कैद गेंदालाल को छुड़ाने आये बिस्मिल

संलग्न चित्र:
1) पं. रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा में प्रकाशित पं.गेंदालाल दीक्षित का रेखा चित्र।
2) 1 सितंम्बर 1924 को #प्रभा मासिक पत्रिका के मुखपृष्ठ पर गेंदालाल दीक्षित।
3) प्रभा में प्रकाशित लेख-मैनपुरी षड्यंत्र के नेता-स्वर्गीय प.गेंदालाल दीक्षित।
यह लेख बिस्मिल ने ही छद्म नाम ‘अज्ञातनाम’ से लिखा था।

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