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क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य पं गेंदालाल दीक्षित

जंगे आज़ादी में चंबल घाटी के सूरमा ( भाग-1)

क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य पंडित गेंदालाल दीक्षित

० अंग्रेजों के खिलाफ़ सबसे बड़े सशस्त्र संगठन
‘मातृवेदी’ और ‘शिवाजी समिति’ के संस्थापक

० पं.रामप्रसाद बिस्मिल ने माना था अपना
गुरु और उनसे सीखा था बंदूक चलाना

० डॉराकेश पाठक

पण्डित गेंदालाल दीक्षित

आज़ादी के संघर्ष में चंबल घाटी का इतिहास क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य पंडित गेंदालाल दीक्षित के बिना अधूरा है। थोड़ा कम चर्चित रहे गेंदालाल बहुचर्चित मैनपुरी षड्यंत्र केस में शिवकृष्ण अग्रवाल,मुकुन्दीलाल आदि के साथ बराबर के साथी थे।

उन्होंने एक समय अंग्रजों के खिलाफ़ जंग के लिये सबसे बड़ा सशस्त्र संगठन खड़ा कर लिया था। लेकिन दो बार उनके साथ बड़ी ग़द्दारी हुई और उनकी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं।

मैनपुरी केस में गिरफ़्तारी के बाद जब वे एक बार जेल तोड़ कर फ़रार हुए तो जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। यहां तक कि गेंदालाल दीक्षित से अंग्रेज इतना ख़ौफ़ खाते थे कि उनकी मौत के बीस साल बाद तक उनकी तलाश करते रहे। सन 2020 उनका बलिदान शताब्दी वर्ष भी है।

० कौन थे पंडित गेंदालाल दीक्षित

गेंदालाल दीक्षित का जन्म बटेश्वर(आगरा) के पास मई गांव में 30 नवम्बर 1888 में अच्छे खाते पीते घर में हुआ था। पिता का नाम भोलानाथ और माँ का नाम विचित्रा देवी था। उनके कुटुंब को तत्कालीन भदावर राज परिवार ख़ूब मान सम्मान देता था।
जब गेंदालाल महज दो बरस के थे तब उनकी माँ बकेवर(इटावा)में चल बसीं।तब उनकी ताई ताऊ ने उन्हें पाला पोसा।

इटावा के ही ह्यूम हायर सेकेंडरी में गेंदालाल ने पढ़ाई की।
(स्कूल उन्हीं ए.ओ. ह्यूम के नाम पर था जो बाद में कांग्रेस के संस्थापक बने। ह्यूम इटावा के कलेक्टर रहे थे)

एसएलसी की परीक्षा पास करने के बाद गेंदालाल का दाख़िला आगरा मेडिकल कॉलेज में हो गया लेकिन उनका मन नहीं लगा तो कॉलेज छोड़ दिया।

इस बीच देश में बंग-भंग के खिलाफ़ आंदोलन अंगड़ाई ले रहा था। बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ रहीं थीं।
उधर महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने शिवाजी जयंती का आह्वान कर दिया था।

तिलक से प्रभावित होकर ही गेंदालाल ने सबसे पहले क्रांतिकारी संगठन ‘शिवाजी समिति’ का गठन किया।
इस समिति में उनके साथ आये मैनपुरी के मुकुंदी लाल जो बाद में विख्यात मैनपुरी षड्यंत्र केस में भी अभियुक्त बने।

शिवाजी समिति का विस्तार पूरे चंबल-यमुना दोआब में करने के बाद करीब 40 जिलों में इसकी शाखाएं बना ली गईं। अब तक गेंदालाल दीक्षित औरैया में डीएवी स्कूल में पहले मास्टर फिर हेड मास्टर बन चुके थे।
दिन में स्कूल में पढ़ाते और रात में क्रांतिकारी गतिविधियों का तानाबाना बुनते थे।

शिवाजी समिति में युवाओं को भर्ती करने के लिये गेंदालाल लगातार दौरे करते रहते थे। तत्कालीन संयुक्त प्रान्त(आज का उत्तर प्रदेश)पंजाब,महाराष्ट्र,मध्य भारत हर जगह उनका आना जाना बढ़ गया था। वे नाम और भेष बदलने में माहिर थे सो लंबे समय तक अंग्रेजों को उनको भनक नहीं लगी।

इसी अभियान में गेंदालाल की भेंट मथुरा में ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद और शाहजहाँपुर में युवा राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। बिस्मिल गेंदालाल की क्रांतिकारी योजनाओं से बहुत प्रभावित हुए उनके संगठन में शामिल हो गए। लक्ष्मणानंद उनके साथ हो लिये। बाद में बिस्मिल को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग गेंदालाल और लक्ष्मणानंद ने ही बाह-पिनाहट के पास चंबल के बीहड़ में दी।

शिवाजी समिति ने सशस्त्र क्रांति की तैयारी शुरू कर दी।भिंड,ग्वालियर, इटावा,औरैया,मैनपुरी से चोरी छिपे हथियार लाये जाने लगे।

अब तक गेंदालाल दीक्षित का संपर्क बंगाल के क्रांतिकारियों रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल,बाघा जतीन, महाराष्ट्र के विष्णु गणेश पिंगले आदि से हो चुका था।
क्रांतिकारियों से व्यापक संपर्क के बाद पंडित गेंदालाल दीक्षित ने उस दौर के सबसे बड़े सशस्त्र क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की जिसे नाम दिया गया मातृवेदी दल।
इस दल में चंबल घाटी के उस समय के सब बड़े दस्यु सरगना पंचम सिंह और उसका पूरा गिरोह भी शामिल हुआ।

संदर्भ : जुनूनी पत्रकार और हमारे अनुज समान मित्र शाह आलम Shah Alam ने गेंदालाल दीक्षित पर लंबे शोध के बाद प्रामाणिक जानकारी के साथ किताब लिखी है।

(जारी..)
अगले भाग में पढिये-
० मातृवेदी दल ने बड़ी सशस्त्र क्रांति के लिए
बना ली थी पैदल,घुड़सवार सेना

० चंबल घाटी के दस्यु गिरोह को क्रांति
की धारा में लेकर आये गेंदालाल

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