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सियासत के खेल में उलझकर रह गया लाईट, कैमरा, एक्शन …!

सियासत के खेल में उलझकर रह गया लाईट, कैमरा, एक्शन …!

▪प्रदीप शर्मा

साहित्य और सिनेमा को समाज की मशाल कहा जाता है । आजादी के पहले और आजादी के बाद अब तक सिनेमा ने, खासकर भारतीय समाज में मूल्यों और उसके विचार करने के तौर तरिकों को बहुत हद तक बदला है । जहां आजादी के पहले इक्का—दुक्का फिल्मे बनी, जो धार्मिकता और पौराणिक आख्यानों पर आधारित रही तो आजादी के बाद भारतीय फिल्मकारों ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत बनाने वाली कहानियों पर काम करना शुरु किया । ये दौर 60 के दशक तक चला ।

इसके बाद क्लासिक,रोमांस का सिलसिला चला जो 70 के दशक तक शीर्ष पर रहा । बाद में श्रमिक आंदोलन और न्यायिक अधिकारों पर आधारित कहानियों का दौर चला । 1990 के बाद उच्च शिक्षा और कॉलेज कल्चर से जुड़ी प्रेम कहानियां पर्दे पर आई और देखते ही देखते सिनेमा ने सरोकार और व्यवसाय के पलड़े को असंतुलित करना शुरु कर दिया । वर्तमान में मुनाफा और विंडो कलेक्शन फिल्मों की सफलता का आधार माना जाने लगा है ।

इन सभी के बीच भी सिनेमा स्वतंत्र रुप से अपना काम कर रहा था । बॉलीवूड से सुनिल दत्त,राजेश खन्ना,अमिताभ बच्चन,जावेद अख्तर,रेखा,जया भादुड़ी,विनोद खन्ना,गोविंदा जैस कलाकार आम चुनाव और राज्यसभा के जरिए माननीय सांसद बने । दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल से भी कई कलाकर राजनीति में आए और बड़े ओहदों तक भी पहुंचे ।

 

यहां तक भी भारतीय सिनेमा उद्योग पर वामपंथ और दक्षिणपंथ की खाई हावी नहीं हुई थी । लेकिन देखने में आ रहा है कि 2014 के बाद भारतीय सिनेमा राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता की भूमिका में बदलता हुआ दिखाई दे रहा हैं । कलाकारों का एक धड़ा केन्द्र सरकार और उसकी विचारधारा को पोषण देने की मुद्रा में आ गया है, इस कड़ी में अनुपम खेर,अशोक पंडित,अक्षय कुमार,विक्की कौशल,मधुर भंडारकर सबसे आगे है, तो जो धड़ा सरकार से मुद्दाई लड़ाई लड़ रहा हैं उनमे नसीरउद्दीन शाह, श्याम बेनेगल,अनुराग कश्यप,स्वरा भास्कर,नंदिता दास,सुशांत सिंह जैसे दूसरे कलाकार शामिल हैं ।

यह देखकर कहना आसान है कि जिस तरह कलाकार वैचारिक स्तर पर दो फाड़ हो चुके हैं ठीक उसी तरह समाज भी दो फाड़ हो चुका है..विडंबना ये है कि सियासत के लिए समाज का होना जरुरी है और सियासत समाज को ही खाकर बलिष्ठ होने का मंसूबा पाले बैठी है ।
कलाकार भी भारतीय नागरिक है और उन्हे भी अपनी बात रखने या किसी विचारधारा के साथ रहने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन देखने में ये भी आ रहा है कि फिल्मों के जरिए मुद्दों को उछालने की जो टाइमिंग होती है उससे कलाकरों पर सवाल उठना लाजमी है । उदाहरण के तौर पर लोकसभा चुनाव के पहले 11 जनवरी 2019 को उरी फिल्म रिलीज होना ।

इसी दौरान अनुपम खैर अभिनित फिल्म ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का आना और अभिनेता अक्षय कुमार का एक इलेक्ट्रानिक समाचार एजेंसी के लिए रिपोर्टर बनकर पीएम मोदी का साक्षात्कार करना कई सवाल खड़े करता है । इतना ही नहीं अक्षय कुमार का ‘टॉयलेट’ फिल्म में काम करना भी ये सवाल उठाने का आधार है कि क्या वो अभिनेता की खोल में प्रचारक की भूमिका में आ गए हैं ? अनुपम खैर जहां कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का सवाल जोर शोर से उठाते हैं लेकिन केन्द्र सरकार ने पिछले 6 वर्षों में कितने पंडितों को बसाया उनकी लिस्ट नहीं मांगते ? अक्षय कुमार ‘टॉयलेट’ फिल्म में अभिनय तो करते है लेकिन देश के अनेक ओएसडी घोषित गांवों में आधे—अधूरे टॉयलेट बने है और घपले—घोटाले हुए हैं इस पर वो खामोश हैं ? उरी में काम करने वाले विक्की कौशल पीएम के साथ फोटो तो खिंचवाने चले जाते है पर पुलवामा पर सवाल करना भूल जाते है ?

अभी ताजा मसला सीएएए,एनपीआर और एनआरसी का ही ले ले । देशभर में सरकार के पक्ष और विपक्ष में आंदोलन हो रहे हैं । इस आंदोलन के समर्थन और विरोध में भी बॉलीवूड सामने आया है । साल 2014 के बाद दो टूकड़ों में बंटा भारतीय सिनेमा का एक पक्ष सरकार के पक्ष में है तो दूसरा लगातार आंदोलन में भाग ले रहा है । देखने में आ रहा है कि केन्द्र सरकार से नीतिगत या फिर वैचारिक स्तर पर मतभिन्नता रखने वाले कलाकारों को पाकिस्तान परस्त और देशद्रोही कहा जा रहा है ।

हैरत की बात है कि सरकार के पक्ष में खड़ा कलाकारों का एक पक्ष अपने कलाकार साथियों की वैचारिक आजादी के पक्ष में आगे आकर बोलने से परहेज कर रहा है । जनाब ये सत्ता और सियासत का खैल है, किसी ने कहा है सत्ता वो सर्पणी है जो वक्त आने पर अपने बच्चों को भी खा जाती है ।

(लेखक सुपरिचित संवाद लेखक एवं फिल्म कार हैं और
सेंट्रल इंडिया फिल्म एसोसिएशन, मध्यप्रदेश के अध्यक्ष भी हैं)

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