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सप्रे संग्रहालय में पाण्डुलिपियों और दुर्लभ संदर्भ संपदा का डिजिटाइजेशन आरंभ

सप्रे संग्रहालय में पाण्डुलिपियों और
दुर्लभ संदर्भ संपदा का डिजिटाइजेशन आरंभ

ज्ञान तीर्थ सप्रे संग्रहालय में सँजोयी गई दुर्लभ संदर्भ संपदा और पाण्डुलिपियों के डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया 22 नवंबर से आरंभ हो गई है। राष्ट्र की अनमोल बौद्धिक धरोहर के विज्ञान सम्मत रखरखाव की दिशा में यह बड़ा कदम है। अधुनातन सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से पहले चरण में लगभग एक करोड़ पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। प्रक्रिया की शुरुआत भारत के पहले समाचारपत्र – जनवरी 1780 में प्रकाशित ‘हिकीज गजट’ से की गई।

डिजिटलीकरण की प्रक्रिया का शुभारंभ विजयदत्त श्रीधर, डा. शिवकुमार अवस्थी, डा. रामाश्रय रत्नेश, डा. अल्पना त्रिवेदी, डा. मंगला अनुजा और प्रोजेक्ट इंचार्ज मनीष मिश्र ने किया। सप्रे संग्रहालय के आधुनिकीकरण की यह प्रक्रिया इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की महत्वपूर्ण इकाई – राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के सहयोग से हो रही है। केन्द्र के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय और सदस्य सचिव डा. सच्चिदानन्द जोशी ने इस परियोजना को फलीभूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर साधना देवांगन, विवेक श्रीधर, वंदना एवं नेहा केवट भी उपस्थित थे।

सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने बताया कि सन 1512 की पाण्डुलिपि समेत करीब 2000 पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन होगा। साथ ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, माधवराव सप्रे, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बनारसीदास चतुर्वेदी, रामरख सहगल, श्याम सुन्दर दास, माखनलाल चतुर्वेदी, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, गणेश शंकर विद्यार्थी, महात्मा गांधी, प्रेमचन्द, लाल बलदेव सिंह, रायबहादुर हीरालाल, कामताप्रसाद गुरु प्रभृति यशस्वी विद्वानों के कालजयी कृतित्व को डिजिटल फार्म में शोधकर्ताओं के ज्ञान-लाभ के लिए सुरक्षित और ‘आन लाइन’ उपलब्ध कराया जाएगा।

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